Uttarakhand: Police Service Rules Challenged In High Court – उत्तराखंड: पुलिस सेवा नियमावली को हाईकोर्ट में चुनौती, सरकार को जबाव दाखिल करने के निर्देश

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न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नैनीताल

Updated Wed, 14 Oct 2020 12:15 AM IST

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उत्तराखंड पुलिस विभाग की ओर से हाल ही में जारी पुलिस सेवा नियामावली-2018 (संशोधित सेवा नियमावली 2019) को पुलिस कर्मियों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी है। याचिका पर सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने सरकार को जबाव दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।

मुख्य न्यायाधीश रवि कुमार मलिमथ एवं न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार सत्येंद्र कुमार और अन्य ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा है कि इस सेवा नियमावली के अनुसार पुलिस कांस्टेबल आर्म्ड फोर्स को पदोन्नति के अधिक मौके दिए गए हैं, जबकि सिविल और इंटलीजेंस में उन्हें पदोन्नति के लिए कई चरणों से गुजरना पड़ता है।

याचिकाकर्ता पुलिसकर्मियों का कहना है कि उप निरीक्षक से निरीक्षक और अन्य उच्च पदों पर अधिकारियों की पदोन्नति निश्चित समय पर केवल डीपीसी से वरिष्ठता/ज्येष्ठता के आधार पर होती है। याचिका में कहा गया कि पुलिस विभाग की रीढ़ की हड्डी कहे जाने वाले पुलिस के सिपाहियों को पदोन्नति के लिए उपरोक्त मापदंड न अपनाते हुए अलग-अलग प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है, विभागीय परीक्षा देनी पड़ती है।

पास होने के बाद 5 किमी की दौड़ लगानी पड़ती है। इन प्रक्रियाओं को पास करने के बाद कर्मियो के सेवा अभिलेखों के परीक्षण के बाद पदोन्नति होती है इस प्रकार उच्च अधिकारियों द्वारा निचले स्तर के कर्मचारियों के साथ दोहरा मानक अपनाया जाता है, जिस कारण 25 से 30 वर्ष की संतोषजनक सेवा करने के बाद भी सिपाहियों की पदोन्नति नहीं हो पाती है।

अधिकतर पुलिसकर्मी सिपाही के पद पर भर्ती होते हैं और सिपाही के पद से ही सेवानिवृत्त हो जाते हैं, क्योकि निचले स्तर के कर्मचारियों की पदोन्नति के लिए कोई निश्चित समय अवधि निर्धारित नहीं की गई है और ना ही उच्चाधिकारियों ने कभी इस ओर ध्यान दिया। नियमावली में समानता के अवसर का भी उल्लंघन किया गया है। पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सरकार को जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।

उत्तराखंड पुलिस विभाग की ओर से हाल ही में जारी पुलिस सेवा नियामावली-2018 (संशोधित सेवा नियमावली 2019) को पुलिस कर्मियों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी है। याचिका पर सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने सरकार को जबाव दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।

मुख्य न्यायाधीश रवि कुमार मलिमथ एवं न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार सत्येंद्र कुमार और अन्य ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा है कि इस सेवा नियमावली के अनुसार पुलिस कांस्टेबल आर्म्ड फोर्स को पदोन्नति के अधिक मौके दिए गए हैं, जबकि सिविल और इंटलीजेंस में उन्हें पदोन्नति के लिए कई चरणों से गुजरना पड़ता है।

याचिकाकर्ता पुलिसकर्मियों का कहना है कि उप निरीक्षक से निरीक्षक और अन्य उच्च पदों पर अधिकारियों की पदोन्नति निश्चित समय पर केवल डीपीसी से वरिष्ठता/ज्येष्ठता के आधार पर होती है। याचिका में कहा गया कि पुलिस विभाग की रीढ़ की हड्डी कहे जाने वाले पुलिस के सिपाहियों को पदोन्नति के लिए उपरोक्त मापदंड न अपनाते हुए अलग-अलग प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है, विभागीय परीक्षा देनी पड़ती है।

पास होने के बाद 5 किमी की दौड़ लगानी पड़ती है। इन प्रक्रियाओं को पास करने के बाद कर्मियो के सेवा अभिलेखों के परीक्षण के बाद पदोन्नति होती है इस प्रकार उच्च अधिकारियों द्वारा निचले स्तर के कर्मचारियों के साथ दोहरा मानक अपनाया जाता है, जिस कारण 25 से 30 वर्ष की संतोषजनक सेवा करने के बाद भी सिपाहियों की पदोन्नति नहीं हो पाती है।

अधिकतर पुलिसकर्मी सिपाही के पद पर भर्ती होते हैं और सिपाही के पद से ही सेवानिवृत्त हो जाते हैं, क्योकि निचले स्तर के कर्मचारियों की पदोन्नति के लिए कोई निश्चित समय अवधि निर्धारित नहीं की गई है और ना ही उच्चाधिकारियों ने कभी इस ओर ध्यान दिया। नियमावली में समानता के अवसर का भी उल्लंघन किया गया है। पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सरकार को जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।



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